शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

'आवाज़ें मेरे अन्दर' काव्य-संग्रह का लोकार्पण एवं पुस्तक चर्चा: एक रिपोर्ट - डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'




(मेरी पुस्तक के विमोचन पर मेरे संस्मरण इस प्रेस रिपोर्ट में)
'आवाज़ें मेरे अन्दर' काव्य-संग्रह का लोकार्पण चंडीगढ़ में हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध रचनाकार-समीक्षक डा.रमेश कुंतल मेघ की अध्यक्षता में ४-१-२०१५ को हुआ। इसमें प्रसिद्ध नाटककार, कहानीकार, डा. वीरेन्द्र मेहंदीरत्ता मुख्यातिथि व हिन्दी साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डा. श्याम सखा 'श्याम' विशिष्ट अतिथि थे। हिंदी भाषा एवं साहित्य से जुड़े जाने माने तथा उभरते  रचनाकारों, समीक्षकों एवं मीडिया से जुड़े वर्तमान व पूर्व संपादक, संवाददाता-मित्रों ने सम्मलेन में उपस्थित होकर इसकी गरिमा को बढ़ाया। 
मुख्य वक्ता पूर्व प्राचार्य डा. कैलाश आल्हुवालिया ने अपने पर्चे में 'आवाज़ें मेरे अन्दर : एक दृष्टि' में अपने विचारों को सांझा करते हुए कहा कि इन फुटकर कविताओं के काव्य-संग्रह में वृहद और गहरा होने की अनेक संभावनाएं हैं। इन कविताओं में कोई एक विचारधारा नहीं अपितु अनेक विचारधाराएं समानांतर चलती हैं जो पाठक के विवेक को झकझोरती हैं। ये एक ऐसी यात्राएं हैं जो विवेक से भावना की ओर झुककर लरज़तर गति पकड़ती-सी महसूस होती हैं, ज्ञान और अज्ञान, विवेक और भाव के बीच एक कशमकश-सी दिखाई देती है। 'मंथन' कविता में ज्ञान से सम्बंधित प्रश्न हैं तो 'माया जाल' कविता विशेष विश्लेषण की मांग करती है क्योंकि इसमें कई धरातल, कई मोड़ और कई तहें हैं। कविता के संकट पर भी कवयित्री की दृष्टि अपनी चिंता को व्यक्त करती है 'अक्षर, अनाम को कहाँ ढूंढें कविता और नई अभिव्यक्ति कैसे दे।' 'उनके लिए', 'युग पुरुष', 'अमृत कलश', 'उसने कहा था', 'जुहार', 'मुखौटा', भयभीत आँखें', 'मुद्दा', 'मैं सीता सती हूँ', 'बन्दर और भेढ़', 'युक्लिप्टस', 'कविता धर्म' ऐसी जनवादी कविताएँ हैं जो कई प्रश्नों से पाठकों का साक्षात्कार तो करवाती ही हैं साथ में इनमें आक्रोश है, पर घुटन अधिक है, इनमें असंतोष है। बच्चों पर लिखी गई प्रेमपुष्प की कविताएँ मीठी लोरी नहीं हैं अपितु इन कविताओं में बच्चा जहाँ भविष्य है देश का, 'गर्त में गिरा है', वहीँ उसका सहज बालपन छिन गया है, तो सहज बालपन को कुटिलता की पाठशाला में बदलने का प्रयास भी किया गया है ताकि इस कुटिल समाज को समझ सके। 'संवाद','हीर' नारी की यथार्थ स्थिति की अभिव्यक्ति है। वैचारिक विश्लेषण के साथ डा. आल्हुवालिया ने इनमें अछूते प्रतीक-बिम्बों, शब्द-चयन, व्यंग्योक्तियों या गहरे कटाक्ष, जो सीधे न होकर सांकेतिक हैं; का वर्णन किया है साथ ही यह विशेष तौर पर बताने की कोशिश की है कि 'प्रेमपुष्प' की इन कवितओं में इक्कीसवीं शताब्दी की नारी का विद्रोह ही नहीं, अपितु  यह विगत काल की विवशता का वर्णन भी करता है, जिसे सामयिक सन्दर्भों से जोड़ा गया है। ये कविताएँ एक सामान्य (जन के) 'मेंटल-ब्लाक' की ओर भी संकेत करती हैं और नई भूमि तोड़ने का प्रयास भी हैं। 
कवयित्री ने 'आवाज़ें मेरे अन्दर' को ध्वनियों से भी विवेचित किया है, इनकी गूँज जनवादी कविताओं में मुखर है तो कुछ अस्पष्ट-सी दीखती ध्वनियाँ भी बहुत कुछ कह जाती हैं, जिसमें 'फूल की डाली से बिछुड़ने की क्रिया', 'षड्यंत्र से उपजते संकेत' हैं तो ये आवाजें रहस्यभरी भी हैं। ऐसी आवाज़ों के पीछे कोई तर्क नहीं भावों का उद्वेलन है, फिर भी एक बहुत ख़तरनाक क्रांतिकारी ध्वनि का आभास होता है। दमघोटू वातावरण में घुटन और छटपटाहट का चित्रण कई अन्य कविताओं में है। काव्यसंग्रह तीन खण्डों में विभाजित है। प्रथम भाग-'कविता' का विवेचन करते हुए इसकी अंतिम कविता 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' को कैलाश आल्हुवालिया ने कवयित्री द्वारा व्यक्त मानव रक्षा और सृष्टि के कण-कण में सौन्दर्य भरने को एक ईमानदार चिंता बताया। दूसरे भाग-'ग़ज़ल' की चार ग़ज़लों में सामाजिक विसंगतियों को ग़ज़ल में कहना ग़ज़ल में एक बदलाव का सूचक है, जो इसकी बनावट को ही बदलता दीखता है। इसमें सुरा-सुराही, आशिक-माशूक से हट कर हिन्दी ग़ज़ल की अपनी शब्दावली, ताव, तड़प और वैसी ही शिद्दत इन चार ग़ज़लों से बड़ी आशा बंधाती हैं। और संग्रह के तीसरे भाग-'नज़्म' में दो नज़्में 'सहारा' और 'समय' में ताज़गी है, भाषा की सघनता, सटीकता, मोहकता और ख़ूबसूरती है। संग्रह के अंतिम भाग- 'गीत' में चार ख़ूबसूरत गीत हैं जिनमें एक ध्वनि अनुगूंज की तरह प्रतिध्वनित होती हैं। डा. कैलाश जी के अनुसार इन कविताओं को पढ़कर एक लम्बे मरुथल से निकल कर हरे-भरे बाग़ तक पहुँचाने का अहसास होता है, ये कविताएं निःसंदेह अन्दर की आवाज़ें हैं जो अंतिम पन्ने 'न-इति' या नेति-नेति....' कभी न बंद होने का संकेत करती हुई, एक दिशा-विशेष का संकेत देती हैं और अंतिम के ख़ाली चार पन्ने प्रकाशक की विविशता नहीं बल्कि ख़लाअ को भरने का चैलेन्ज भी हैं। 
दूसरा पर्चा प्रस्तुत करते हुए डा.प्रदीप शर्मा 'स्नेही' ने अपने वक्तव्य में कहा कि -विभिन्न कालखंडों में सृजित प्रेमलता जी की कविताएँ न केवल अंतस को उद्वेलित करती हैं, अपितु यथास्थिति की जड़ता को तोड़ने के लिए जनसामान्य को प्रेरित करती हुई प्रतीत होती हैं। इनमें 'मैं सीता सती हूँ', 'जुहार', 'मंथन', 'बोर होल में गिरा बच्चा', 'उनके लिए', 'लोह मानव', 'खोया संगीत' ऐसी ही कविताएँ हैं जो पाठकों के अन्तर्मन को झकझोरती हैं। समग्रतः, प्रेमलता जी की कविताएँ सामाजिक सरोकारों से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं, जहाँ एक ओर उनकी कविताओं में सामाजिक समस्याएँ, विद्रूपताएं मुखरित हुई हैं, वहीँ इनके निवारण का निरूपण भी बखूबी चित्रित हुआ है। प्रेमलता जी के इस अभिनव महनीय प्रयास का पाठकवर्ग में भरपूर स्वागत होगा और भविष्य में भी इनकी लेखनी से यों ही कविताओं का निर्झर निरंतर प्रस्फुटित होता रहेगा, इस पर विश्वास जताया और कामना भी की।           
तीसरे पर्चे के पाठक, डॉ सुशील 'हसरत' नरेलवी ने अपने पर्चे को 'कुंठित, कुटिल, कुत्सित व्यवस्था के प्रति आक्रोश का उदघोष-आवाजें मेरे अन्दर' से परिभाषित किया। काव्य-संग्रह 'आवाजें मेरे अन्दर' पुस्तक के मुद्रण और सज्जा की प्रशंसा करते हुए कविताओं की रचना तिथि दिए जाने पर कवयित्री की डायरी लेखन की आदत की सराहना भी की। कविताओं के कथ्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें समाज में व्याप्त विद्रूपताओं व अनाचार के प्रति रोष तो है ही; साथ ही चुप्पी साधे बैठे उसी समाज के अभिन्न अंग जनमानस को प्रतिकार के लिए भी उकसाती हैं और यही इस कृति की कविताओं की शक्ति है। सर्वहारा की दिनदैन्य की लाचार सीमाओं, पीड़ाओं, उपेक्षाओं के प्रति पाठक-मन को झकझोरती, भ्रष्टतंत्र व निरंकुश व्यवस्था के प्रति आमजन को उद्वेलित, मुखरित होने को भी प्रेरित करती हैं। इस काव्य-संग्रह की विविधतापूर्ण कविताओं के सन्दर्भ देकर, नरेलवी ने प्रत्येक कविता की पृष्ठ संख्या से कटाक्ष, तीखे व्यंग्य, आक्रोश' की सशक्त व सन्दर्भ सहित विवेचना की। ग़ज़लों की बात करते हुए 'रौशनी', 'बातें करें' के विषय में कहा कि ये ग़ज़लें भावपक्ष व कलापक्ष से ग़ज़ल के मानदंडों पर खरी उतरती हैं तथा नरेलावी जी के अनुसार इस काव्य-संग्रह की नज़्में ख़ूबसूरत अंदाज़ में 'सहारा' और 'समय' क्रमशः गरीबी का दारुण चित्रांकन करती हैं और आंतरिक ज्वाला को सहेजने की बात भी करती हैं। संग्रह के अंतिम भाग 'गीत' के गीतों में सकारात्मकता, आकुल हृदयों के स्पंदन की उद्वेलित अनुभूतियाँ हैं। साररूप में नरेलवी ने बताया कि प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' की इन कविताओं का मिजाज़ आक्रोशात्मक और स्वर विद्रोही है, शैली आकर्षक व भाषा कलात्मक है, इनकी छंदमुक्त कविताओं में भी एक अंतर्लय है जिसका आजकल की कविताओं में अभाव है। वे सटीक प्रतीकों के जरिए कथ्य-भाव को एक यथोचित अभिव्यक्ति देती हैं जो पाठक की रुचि को बढ़ाती हैं। 'आवाजें मेरे अन्दर' साहित्य-जगत व पाठकों के लिए एक अच्छा काव्य संग्रह है कवयित्री को साधुवाद!                               
हिंदी के जाने माने कहानीकार व 'पुष्पगंधा' हिंदी पत्रिका के सम्पादक विकेश निझावन ने अपनी विशेष टिप्पणी में 'खोया संगीत', 'कृषक नियति' पर बात करते हुए लेखिका की रचना प्रक्रिया की पुरज़ोर सराहना की, जो कवयित्री ने संग्रह भूमिका 'दो शब्द' में लिखा  है कि -'आवाज़ें मेरे अन्दर' उन उद्वेलित भावों की काव्योक्तियां हैं जो कविता के कलेवर में ढलने तक मानो मेरा अमन-चैन ही गिरवी रखती रही हैं। उठते-बैठते, खाना बनाते-खाते, यहाँ तक कि किसी से बातें करते भी पीछा न छोड़ती।' विकेश जी के अनुसार कविता केवल रसरंजन या मनोरंजन नहीं ये कविताए एक नई ऊर्जा का स्रोत हैं; दूसरे ये युग-साहित्य की मुख्यधारा का अनुसरण भी करती हैं; साथ ही इन कविताओं की भाषा, भाव और अभिव्यक्ति कई स्तरों पर अपनी पृथक पहचान कराने में सक्षम है। ये कविताएँ अपनी सरलता, तरलता एवं सहज संवेदना के बल पर पाठकों पर अपनी छाप अवश्य छोड़ेंगी। 
हिंदी साहित्य जगत के जाने माने हस्ताक्षर डा. मैथिली प्रसाद भारद्वाज ने इन कविताओं की समीक्षा करते हुए बताया कि ये कवितायेँ डा.प्रेमलता की वर्षों से चली आ रही सतत साधना की परिणति हैं न कि ताज़ा लिखी रचनाएं, इस संग्रह में ७०वें दशक से २००६ तक की कविताएँ हैं जो इस बात की साक्षी हैं। वैसे तो आज कल बहुत से काव्य-संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं किन्तु अच्छी कविताएँ एक मुद्दत के बाद पढ़ने को मिली हैं। इनकी कविताओं को पढ़ने के बाद ऐसा महसूस हुआ कि लम्बे रेगिस्तान को पार करने के बाद कोई नखलिस्तान में पहुँच जाए। पुस्तक की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि इसका अशुद्धि रहित मुद्रण इसे एक स्तरीय पुस्तक के मानदंडों पर खरा उतारता है ही साथ ही इसकी साज-सज्जा एक अच्छी व स्तरीय पुस्तक होने का अहसास दिलाती है। कविताएँ तो हैं ही उम्दा, यह पुस्तक भी अपनी अलग ही पहचान रखती हैं। 
डा.वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता ने इस काव्य-संग्रह के विषय में कहा कि मैं डा.भारद्वाज जी से पूरी तरह सहमत हूँ कि बहुत अरसे के बाद अच्छी कवितायेँ पढ़ने को मिली हैं। पर कविता तो कविता होती है अगर जनवादी शब्द न भी लगाते तो भी हर्ज नहीं था। इस कथन का खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि  इन कविताओं में कुछ कवितायेँ इतनी संवेदनशील हैं कि उन्हें जनवाद के दायरे में सीमित करने से उनकी उंचाई में कुछ कमी आती प्रतीत होती है। इस काव्य-संग्रह में लेखनी की गहन परिपक्वता एवं संवेदनशीलता है। ये कवितायेँ निश्चित रूप से मन पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।
डॉ. श्याम सखा 'श्याम' ने 'आवाज़ें मेरे अन्दर' काव्य-संग्रह की भाषा एवं शैली को आम आदमी की समझ से बाहर बताते हुए, गीति-काव्य की ओर आम पाठकों की रूचि की बात की और कहा कि ऐसी कविताएँ सामान्य-जन तक बहुत कम पहुँच पाती हैं।        
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में काव्य-भाषा पर उठाए गए प्रश्न को स्पष्ट करते हुए रमेश कुंतल मेघ ने शूद्रक के 'मृच्छकटिकम्',  व कालिदास के 'मालविका अग्निमित्रं' का ज़िक्र करते हुए कहा कि जब ये नाटक प्राकृत संस्कृत में लिखे गए तो उस समय उनकी बहुत आलोचना हुई थी, किन्तु बाद में उसके सभी पात्र स्वीकृत हुए और 'मृच्छकटिकम्' का चारुदत्त तो वैश्या के आदर्श प्रेम के कारण आदर्श मानव की श्रेणी (केटेगरी) में आ गया। इसीलिए लोकरूचि और कभी-कभी मर्यादाएं कही न कहीं अभिव्यक्ति को रोक देती हैं लेकिन ऐसी भाषा लोगों के लिए ही होती है और यह उनके हृदयों तक जाती है। इसी तरह सन्दर्भ में आइन्स्टाइन या कार्लमार्क्स की भाषा का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी भाषा कैसे जनसामान्य तक पहुँच गई क्योंकि उसमें लोकहित की बातें निहित थी। इस काव्य-संग्रह की कविताओं को उन्होंने दिनकर की कल्पनाशीलता से जोड़ा। प्रेमपुष्प की लम्बी कविताओं की मुक्त कंठ से अनुशंसा करते हुए, 'जुहार' को निराला की 'राम की शक्तिपूजा', और 'मैं सीता सती हूँ' को 'सरोज स्मृति' के समकक्ष ठहराया। डा.प्रदीप 'स्नेही' के पर्चे पर सहमति जताते हुए डा. मेघ जी ने सहमति व्यक्त की कि निश्चित रूप से ये कविताएं यथास्थिति की जड़ता को तोड़ती हैं, इनमें सामाजिक सरोकारों के प्रति गहरी चिंता है। डा. कैलाश आल्हुवालिया के कथन कि -ये कविताएँ उलझी बुद्धि की शल्यक्रिया का-सा आभास करती हैं' के विषय में मेघ जी ने कहा कि इन कविताओं में सामाजिक विद्रूपताओं से उपजी विसंगतियों के विरुद्ध छटपटाहट को, विक्षोभ को और यथास्थिति को तोड़ न पाने की विवशता को ज़्यादा बयान किया है न कि उनकी शल्यक्रिया की है।  इसी कथन पर उन्होंने कवयित्री प्रेमपुष्प को कहा कि -'तुम दबे कंठ से कहती हो, मुक्त कंठ से कहो! आपकी कविता अनहद नाद नहीं है बल्कि इंटर्नलाइज़ेशन है।' सामाजिक सन्दर्भों पर चिंता व्यक्त करते हुए मेघ जी ने कहा कि आज संवेदनाएं समाप्त हो गई हैं। अब समय ही नहीं कि कोमलता और भावुकता की तरफ़ जाया जाए। इनकी ये कविताएँ निश्चित रूप से जनवादी ही नहीं बहुजनवादी हैं। प्रेमलता की रचनाएं साहित्य से संस्कृति की ओर ले जाने की साधना है जो कि एक बहुत बड़ी बात है।
इस समारोह का चन्द्र भार्गव ने कुशल संचालन किया व इसके लोकार्पण में डॉ. मैथिलीप्रसाद भारद्वाज, डॉ. रमेश कुंतल मेघ, डॉ. वीरेन्द्र मेंहन्दीरत्ता, डॉ. श्याम सखा 'श्याम', पुष्प राज चसवाल(सं. अनहद कृति: ई-पत्रिका) डॉ. प्रेमलता 'प्रेमपुष्प' (कवयित्री) सहभागी थे एवं सभागार में उपस्थित सभी गणमान्य आगंतुकों व सुख सहायकों का आभार कर्नल शक्ति प्रकाश शर्मा ने किया। कवयित्री के लिए इस समारोह का विशेष आकर्षण ये था कि सभागार में उपस्थित सुख सहायकों (वटरों) ने इस काव्य में रूचि दिखाते हुए टिप के स्थान पर पुस्तक पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर की जिससे लेखिका को सुखद अनुभूति हुई व आशा की एक किरण जागी कि उसकी ये कविताएं आम आदमी तक ज़रूर पहुंचेंगी।  
  
- डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प' 
  संपादक द्वय: अनहद कृति

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बात सगाई की (प्रेमलता प्रेमपुष्प)

'देखो! जानकी जिस घर में मैं तुम्हारी बेटी नीति के रिश्ते की बात चला रही हूँ कसबे के माने हुए ज़मीदार हैं।' 
'पर बुआ..... '
जानकी कुछ आगे कह पाती बुआ ने बीच में ही टोक कर कहा, 'अरी, पर-वर क्या, मैं कहती हूँ, आँख बंद करके हाँ करदे। इतना बड़ा घर-परिवार, मुंह चढ़ कर रिश्ता मांग रहे हैं, राज करेगी तुम्हारी बेटी, उस घर में, राज।'
'पर बुआ, एक तो लड़का टांग से सही नहीं।' 
बुआ ने फिर टोका, 'अरे वो तो ज़रा-सा झुक कर चलता दीखता है, पर यूँ तो लड़का सनक्खा है।'   
'फिर कोई रूज़गार भी तो नहीं उसका।'
'क्या बात करती है, जानकी! उसे रूज़गार की क्या ज़रूरत पड़ी है?'
'फिर भी बुआ, हम ग़रीब सही, पर अपनी पढ़ी-लिखी बेटी को ऐसे कैसे ……'  
उतावली बुआ ने गोशे में ज़ोर देते हुए कहा, 'मैं कह रही हूँ बहुत बड़ा घर है, तेरी बेटी सुबह उठ कर घर बुहारेगी न, तो अपना पेट भरने से ज़्यादा ही अनाज मिल जावेगा उसे, समझी!'
'हाँ! समझी बुआ। अच्छे से समझी।' 
'तो फिर ...क्या बोलूं, उनको कि बात पक्की।'
'हाँ,एक बात पक्की बुआ, उनको कह दे …'
'क्या?'
'यही कि जानकी अपनी पढ़ी-लिखी बेटी को घर बुहार कर पेट भरने की गरज से किसी घर में हरगिज़ न ब्याहेगी। समझी।'
जानकी कह कर चल दी। बुआ हैरानी से आँखें फाड़े अपने मोटे चश्मे से उसे जाते हुए देखती रह गई।