समय की गतिशील निरंतरता जारी है, उहा-पोह की दौड़ में विश्व विभिन्न तरह के घटनाचक्रों में उलझा हुआ है। जब भी क़िताब-कलम उठाई एक नयी तरुणाई का उदय हुआ और साहित्यिक संसार के शब्दों ने कभी झिंझोड़ा, कभी सहलाया, कभी एक ताज़ा-दम सांस, कभी उल्लास और कभी वेदना से परिपूर्ण रुके-रुके से, तो कभी उत्साह से सराबोर नयी सुबह का आगाज़..... दौड़ता हुआ संसार भी सार्थक हो गया, हमारे क़दम दम भर रुक जो पाये…..चश्मे के कोर से ज़रा देखा तो हाथों में तुम्हारे हाथ का एहसास अभी तक नर्म… आह, चाय! लो फिर, कुछ नया सुनो!
शनिवार, 20 सितंबर 2014
सैलाब (डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प')
सैलाब
१
सैलाब उमड़ता है
डूब जाता है कोना-कोना
स्वाभाविक हो या प्राकृतिक
अंतिम परिणति
बस रोना ही रोना!
२
भावों का सैलाब
भिगो जाता है अंतर्मन
फिर
बरसते हैं नयनों से
उमड़ते घन!
३
सैलाब कैसा भी हो
सब कुछ लील जाता है
शून्य निहारता बेबस मानव
भूलों पर
पछताता है?
-डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'
रविवार, 14 सितंबर 2014
गीत: साधना (पुष्पराज चसवाल)
दूर नभ पर घिर रहे गहरे जलद,
साँझ की अमराइयाँ संवला गयीं
सो गया चातक तृषित सपने लिए
और शशि रश्मियाँ गहरा गयीं।
आज मेरा मन तड़पता है उदास,
और मेरी आँख जिज्ञासा भरी
ढूंढती है हर दिशा में रूप
जो कि इसके कोर पोंछे तरी।
यह अनोखा कालपथ हर क्षण यहाँ
सौ अलंकृत भावनाओं को लिए
सोचता है किस तरह किस रंग में
इन सभी की सृष्टि में रह कर जिए।
मैं इसी पथ पर चले जाता अभी
किन्तु मेरी भावनाएं सब कहीं
रह गई नैराश्य वन में, अब मुझे
हे उमड़ते बादलो! रुकना नहीं।
एक दो बूँदें बरसते ही अभी
सत्य है चातक-हृदय संगीत में,
हर्ष की लहरें उठेंगी, पर मुझे ---
शांति का आभास हो किस प्रीत में?
अर्चना के फूल हाथों में लिए
और आँखों में बसाये अश्रु-कण
शून्य पथ पर बढ़ रहा हूँ सोचता
है कहाँ मम ईष्ट का पूजा भवन?
टीस उठती है हृदय में खोज की
और चलते हैं स्वयं ही पग कहीं
जानता हूँ ईष्ट दर्शन हो, न हो
साधना रूकती नहीं, झुकती नहीं।
साधना रूकती नहीं, झुकती नहीं।
- पुष्पराज चसवाल
गीत: खोई-सी वाणी के स्वर (डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प')
खोई-सी वाणी के स्वर अब कहाँ ढूंढने जाऊं।
उद्वेलित अनुभूति को,मैं शब्द कहाँ दे पाऊं?
ठिठुरी सड़कों पर नंगे
पैरों में फटी बियाई।
ओसल सुबहों में उठते,
इन रोओं की गरमाई।
सीने से चिपकी झीनी धोती मैं कहां छिपाऊ।
उद्वेलित अनुभूति को,मैं शब्द कहां दे पाऊँ?
पहरों पर पहरे कब तक,
चुपचाप हृदय के होंगे।
जो देख जिया तड़पेगा,
क्यों ओंठ सिए ही होंगे।
किस अनजानी कन्दरा में बन्धक रूहें धर आऊँ।
उद्वेलित अनुभूति को,मैं शब्द कहां दे पाऊँ?
अभिव्यक्ति तड़पे हर क्षण,
इस मन में और कर्मन में।
जीह्वा तालू से चिपकी,
कर बन्धे हैं अभिनंदन में।
औपचारिकता की सांकल, अब कैसे मैं चटकाऊँ।
उद्वेलित अनुभूति को, मैं शब्द कहां दे पाऊँ?
- डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'
शुक्रवार, 12 सितंबर 2014
रचनाधर्मिता और सामाजिक सन्दर्भ - डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प'
मनुष्य की चिंतन-धारा अजस्र बहती रही है। इस धारा में उसने अपने-पराये सुख-दुःख के क्षणों को कभी वास्तविकता और कभी कल्पना में जी कर सुंदर शब्दों में अलंकृत करके पुनः सृजित करने के प्रयास किए हैं। जीवन के अद्भुत क्षणों की अंतरंग अनुभूतियों की पुनः रचना ही साहित्य होता है। यहीं से साहित्य की अजस्र धारा को निरंतरता और व्यापकता मिलती रही है। साहित्य रचना चाहे वास्तविक अनुभूति हो या जग की देखी-सुनी उसमें कल्पना-शक्ति की छौंक के बिना चटपटापन आ ही नहीं सकता और मानव की प्रकृति ऐसे मसालेदार चटपटेपन से ही आनंद की सीमा तक पहुँचने की आदी रही है। रस के लिए मिठास और स्वादानुभूती के लिए रचनाकारों ने जब अपनी भाषा को विविधतापूर्ण अलंकृत किया तो ही वह साहित्यिक रचना के रूप में ढल कर सामने आई। ये रचनाएं मनुष्य को आनन्दित करने के साथ संपूर्ण मानव के मानवोचित्त जीवन के लिए भी संकल्परत दिखायी पड़ी।
मनुष्य एक कल्पनाशील प्राणी है जो यथाशक्ति में जी कर कभी भी खुश नहीं रहता और निरंतर परिवर्तन के लिए नई-नई कल्पनाएँ करता रहता है। आम आदमी के मन में भी आतंरिक स्तर पर जो कल्पनाएँ उभरती हैं वे समाज की तत्कालीन स्थितियों में परिवर्तन की प्रबल इच्छुक होती हैं, वह यही सोचता है 'ये होता तो कितना अच्छा होता या वो होता तो कितना अच्छा होता'। वह यथाशक्ति में सदैव परिवर्तन का आकांक्षी रहा है। अब प्रश्न उठता है कि इस वैज्ञानिक युग में जहाँ रसायनिक विश्लेषणों के परिणाम निहायत अधिकार की भावना के लिए ही सामने आ रहे हैं और मनुष्य ने दो टूक शब्दों में केवल अपने हित की ही बात कहने-सुनने की आदत डाल ली है। ऐसे में साहित्य की लच्छेदार रसात्मक शब्दावली कहीं निरर्थक प्रयास तो नहीं बन कर रह गई? मनुष्य का कल्पना-जगत केवल अपने स्वार्थों के इर्द-गिर्द घेराबंदी करके रेशम के कीड़े-सा अपने ही बुने मायाजाल में फंसकर तो नहीं रह गया? बात अगर रेशम के कीड़े तक ही रहती तो ज़्यादा ख़तरनाक नहीं थी, मनुष्य की स्वार्थ एवं अहम्-भावना ने इसे उस से भी कहीं आगे बढ़ा कर अपने निजी स्वार्थ एवं सुरक्षा के लिए रेशम के स्थान पर आर.डी.एक्स को लपेटना शुरू कर दिया है - तो मानवता अन्दर तक आतंकित हो उठी है। मानवीय मूल्य दिन-प्रतिदिन रसातल में जाते दीख रहे हैं। क्षोभ, त्रास, भय से आम-आदमी का जीना दूभर हो रहा है। ऐसे में फिर से साहित्य में कहीं-न-कहीं आमूल-चूल परिवर्तन की उत्कट आवश्यकता महसूस हो रही है। ऐसा साहित्य जो फिर से मनुष्य को स्वार्थों से ऊपर उठाकर, मनुष्य की श्रेणी में ला सके, मनुष्य की गरिमा को बढ़ाए और मनुष्य को मनुष्यता की पहचान कराये। मनुष्य जन्म जिसे देवों से भी दुर्लभ माना गया है उस के सही मायने उसे समझाए।
निस्संदेह इस स्वार्थयुक्त और अधिकार भावना में आकंठ डूबे समाज में यह कार्य अत्यधिक कठिन है किंतु असंभव नहीं - देखा गया है कि तत्कालीन समाज में सुधार के लिए परिवर्तन के प्रयास जिन रचनाकारों ने भी किये उन्हें अपने जीते-जी घोर विरोधों का सामना करना पड़ा और विकट परिस्थितियों में जीवनयापन करना पड़ा, किन्तु उनकी साहित्य-साधना और उद्देश्यों की ईमानदारी में लेशमात्र भी कमी नहीं आई। मनुष्य जन्म को देवों से भी दुर्लभ इसलिए माना गया है कि उसमें असम्भव को भी सम्भव बनाने की असीम क्षमता है। तो आईये! हम अपनी उन क्षमताओं को पहचानें और इस संक्रांत समाज में गिरते मानव-मूल्यों को अपने प्रयासों से थामने की कोशिश करें।
ऐसा नहीं है कि पूरे का पूरा समाज केवल स्वार्थ के सम्बंधों से ही लिप्त रहा हो, अनेकों महान विभूतियों ने अपने त्याग और बलिदान से ऐसे प्रेरक उदहारण प्रस्तुत किये हैं जो युगों-युगान्तरों तक आने वाली पीढ़ियों को सन्मार्ग पर प्रशस्त करते रहेंगे। इन्हीं महान विभूतियों के उदात्त प्रयासों की परिणति स्वरूप मानवता की पहचान हो पाती है। यदि ऐसी विभूतियाँ भारत में पैदा न होती तो शायद हम-आप इस खुली हवा में साँस न लेकर गुलामी की बेड़ियों में जकड़े पड़े होते। असंख्य जन ऐसी ही त्याग-भावना को धारण कर अपने प्राणों की सहर्ष आहूतियां दे स्वयं नींव का पत्थर बने, ताकि आज़ाद भारत की सुदृढ़ इमारत उसारी जा सके, और हम स्वच्छन्द रह कर स्वयं अपना विकास कर सकें। आज आज़ादी के छटे दशक के उत्तरार्द्ध पर हम फिर से सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि जिस आज़ाद भारत के स्वप्न को ले कर ये कुर्बानियां दी गई थी क्या वह साकार हो सका! क्या आज की स्थितियां उन स्वप्नों को साकार करने के लिए किन्हीं आमूल चूल परिवर्तन की आकांक्षी होनी चाहियें जिससे कि स्वस्थ समाज की स्थापना हो सके।
साहित्य और शब्द सत्ता - पुष्प राज चसवाल
शब्द की सत्ता अन्यतम रूप से सृष्टि के कण-कण में प्रतिष्ठित रही है। शब्द की महिमा प्रत्येक युग, काल, देश एवं परिस्थिति में इतिहास रचती रही है। वह प्रत्येक युग के यथार्थ का, उसकी संस्कृति एवं सभ्यता का, उसके उत्कर्ष एवं ह्रास का शाश्वत साक्षी रहा है। प्रकृति के रहस्यों को, उसके अनछुए पहलुओं को, छद्म रूपों को उजागर करने के प्रयोजन से मनुष्य द्वारा किए जा रहे जिज्ञासापूर्ण प्रयासों को विश्वसनीय दस्तावेज़ी माध्यम से अभिव्यक्त, सुरक्षित एवं संरक्षित रखने का अनुपम कोष सिद्ध हुआ है शब्द और नि:संदेह चिरकाल तक रहेगा।
शब्द एकार्थी है, द्विअर्थी है और बहुअर्थी है --- शब्द राजनैतिक है, सामाजिक है, आर्थिक है, धार्मिक है, आध्यात्मिक है, नैतिक है एवं अपने सर्वोत्तम रूप में साहित्यिक है --- वह भावनाओं के उद्वेलन को व्यंजित करते हुए भावातिरेक की अतिशयता में भावात्मक है, बौद्धिक तर्क एवं विचारों की अतल गहराइयों में अवगाहन करते समय बौद्धिक गद्यात्मक है। वह काव्यमय चिन्तन का, संगीतात्मक विलास का, कलात्मक प्रतिमा-चित्रों का सहज संवाहक है; शासन-प्रशासन एवं सामाजिक सरोकारों को दिशा प्रदान करते समय वह नीति-उपनीति-राजनीति तथा कूटनीति के प्रयोजनों को सशक्त अभिव्यक्ति देते हुए विभिन्न राष्ट्रों एवं शासन-प्रणालियों के मध्य मैत्रीपूर्ण वार्ताओं व वैचारिक आदान प्रदान के समन्वयात्मक सेतुबंध प्रदान करता है।
सृजन की प्रथम वेला से आजतक शब्द की अंतहीन यात्रा में अनगिनत पड़ाव आए, जिनमें से कई तो मधुर स्मृतियों को संजोए हुए कालान्तर में मानवता के प्रेरणा-पुञ्ज बने जबकि कतिपय अन्य कटु एवं विषाक्त अनुभवों के संवाहक रहे। आदिकवि वाल्मीकि-बुद्ध-प्लेटो-कालिदास-कबीर-शेक्सपियर-मिल्टन-ग़ालिब-गाँधी-लिंकन-लेनिन-दान्ते-गैटे-तालस्ताय जैसे कितने ही शब्द के धनी हुए हैं; वे अपनी कालजयी कृतियों से मनस:-वाच:-कर्मण: मनुष्यता के ऐसे लाजवाब आलोक स्तम्भ बन गए हैं जो जाति-सम्प्रदाय-वर्ण-धर्मान्धता-रंगभेद वगैरह से पूरी तरह ऊपर उठ कर मानवता के सर्वोच्च शिखर से मानव-मात्र के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसके विपरीत कुछेक अधम ऐसे दुर्दान्त दानवी वृत्ति के पोषक हुए जिन्होंने हिंसक पशुता का नंगा नाच खेला तथा शब्द एवं वाणी का दुरूपयोग वीभत्स की सीमा तक करते हुए प्रलयंकारी विध्वंस की विनाशलीला खेली और मानवता को कलंकित किया --- इनमें चंगेज़, तैमुर, गज़नवी, नादिरशाह, अहमदशाह, हिटलर, मुसोलिनी जैसे कई और हृदयहीन आतताई भी शामिल हैं।
अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा से भरे विज्ञानं एवं तकनीकी के इस युग में जहाँ हमें प्रथम पंक्ति में बने हुए अग्रणी भूमिका का निर्वाह करना है वहीं मानव-मात्र के प्रति उदात्त नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा को नित्य-प्रति मिल रही चुनौतियों से निपटने में भी खरा उतरना है। हमें विश्व-समुदाय को याद दिलाते रहना है कि विभिन्न राष्ट्रों द्वारा वैश्विक स्तर पर किए जा रहे आदान-प्रदान, व्यापार-व्यवसाय, बाज़ारवाद, पूंजी-निवेश आदि के प्रयासों में किसी भी प्रकार से किसी के भी द्वारा एकाधिकार की चेष्टा करना विश्व-बन्धुत्व के वृहत्तर उद्देश्य के प्रति घातक हो सकता है। संचार संसाधनों एवं उपकरणों में नित्य-प्रति आ रहे नवीन क्रन्तिकारी परिवर्तनों ने वैश्विकरण एवं बाज़ारवाद के चलते विभिन्न राष्ट्रों तथा समाज-समूहों को जहाँ प्रगति करने एवं विचार-विनिमय के अभूतपूर्व अवसर प्रदान किए हैं वहीं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा व इसमें मची अन्धी दौड़ में आगे निकलने की ललक ने बिना होश खोए पूरी क्षमता के साथ अपनी भूमिका का चयन करना अत्यंत चुनौतिपूर्ण बना दिया है।
हमें सूचना प्रौद्योगिकी से प्रतिक्षण प्रभावित हो रहे इस विज्ञापन युग में भी, निस्संदेह व्यौमफूल से बातें करनी हैं, पर साथ ही धरती मां से जुड़े रहना है। धरती मां का यथार्थ ही हमारी न्याय-परक दृष्टि का, उसकी दिशा का निर्माण करेगा। यदि वह यथार्थ कड़वा है तो लेखन में उस त्रुटि के निराकरण का संकेत ऊर्जापूर्ण संयत शब्दों में साहित्यिक सौष्ठव का निर्वाह करते हुए कोई शब्दकार ही तो करेगा। हाँ, इससे आगे का क्षेत्र किसी शब्द-शिल्पी का न हो कर, सुधारक का है।
प्रख्यात दार्शनिक अरस्तु से लेकर आजतक कितने ही समालोचकों, समीक्षकों, मनीषियों एवं रचनाकारों ने साहित्य/काव्य को परिभाषित करने का सद्प्रयास किया है। किसी ने इसे मात्र बौद्धिक विलास कह कर छुट्टी पा ली तो किसी ने इसे यथार्थ की अनुकृति बता कर मध्यम श्रेणी में रख दिया। कुछेक ने इसे सर्वोत्तम शब्दों के सर्वोत्तम चयन की संज्ञा से अभिहित किया जबकि अन्य ने वियोग/विरह को साहित्यिक सृजन की मूल प्रेरणा माना। कइयों ने साहित्य में शैली को ही सबकुछ मान लिया। सम्भवत: प्रत्येक युग में धरती मां से जुड़े रह कर, उसमें आ रहे परिवर्तनों/घटनाओं/प्रतिक्रियायों को दरपेश आ रही चुनौतियों के मद्देनज़र; देश, काल एवं स्थिति के केन्द्र में न्यायपरक साहित्यिक दृष्टि सजग रूप से बनाये हुए; सामाजिक सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में दलगत राजनीति व साहित्यिक खेमेबन्दी से पूरी तरह ऊपर उठते हुए; हर प्रकार के अन्याय, अत्याचार, दुराचार, अनैतिक आचार एवं शोषण के विरोध में शब्दों के सभ्य अनुशासन को बिना त्यागे, ज़ोरदार आवाज़ में अपना मत रखना है जो शब्दकार की निष्ठा, स्वप्न के प्रति प्रतिबद्धता एवं जनवादी दृष्टि का द्योतक ही कहा जाएगा। हिन्दी के उज्ज्वल भविष्य के प्रति असंख्य सपनों एवं शुभकामनाओं को अंतर्मन में संजोये साहित्यिक शब्दों की ऊर्जा में अभिव्यक्त ऐसा शब्द साहित्य सृजन करने का प्रयास किया जाए जो समूचे मानव समाज को समन्वय-समानता-सहयोग से संपृक्त आदर्श स्वप्न की प्रेरणा देता रहे।
गुरुवार, 11 सितंबर 2014
शब्द
शब्द आदि से ही धरोहर हैं
किन्हीं प्रदत्त अर्थाें की
जिन्हें अक्षर-अक्षर बुना था
अबूझे, अचीन्हे ब्रह्म ने।
ब्रह्म! या फिर
अक्षर है वह स्वयं ही
और निराकार भी
उस अनाम अचीन्हे को कहाॅं ढूंढे कविता,
ताकि
अर्थ सीखचों में कैद छटपटाते शब्दों को
नई अभिव्यक्ति दे
मुक्त करवा सकें,
खुले आसमान पर अंकित
व निर्वसना धरा पर बिछी सभ्यता को,
आदर्शों-आश्वासनों के
सही मायने समझा सकें।
लीक से हट कर
कुछ नैसर्गिक उद्भावना कर सकें
ऐसी उद्भावना जिससे
खुले आसमान और
निर्वसना धरती पर बिछी सभ्यता को
दिशा मिले सही सही।
- डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'
अकेले नितांत अकेले
अकेले नितांत अकेले, अविराम
सागर के असीम विस्तार से आगे
आकाश की कल्पनातीत ऊंचाई से परे
क्षितिज के पार दूर - सुदूर तक- उसके आर-पार,
सौर-मंडल में घूमती, अंतरिक्ष में झूलती
भव्य धरा की आकर्षण-सीमा से आगे
लंबा, बहुत लम्बा सफ़र तै किया मैंने,
किन्तु तुम्हारी रहस्यमय सत्ता के
जादुई विराट दृश्य से वंचित ही रहा,
यहाँ तक वंचित रहा हूँ मैं
कि संभवतः युगों-युगों तक
मेरी यह कालातीत यात्रा
अधूरी ही रहेगी - निरंतर अधूरी,
कौन जाने मेरी इस युगीन यात्रा का
सतत अधूरापन ही कहीं,
वह अंतिम सत्य न हो जो 'होने न होने' के
द्वन्द्व की शाश्वत त्रासदी को
कालान्तर में झेलते हुए, अनायास ही
सम्पूर्ण सत्य के नैसर्गिक उद्घाटन का
विहंगम अवलोकन कर सके,
उस कालजयी मार्मिक क्षण की दिव्यता में
निमिष-भर तिरोहित हो सके,
जिसकी अक्षुण्ण सत्ता के कारण
इस विराट सृष्टि की
व्यापकता एवं सार्थकता
अक्षत है, अनुपम है, अपरिमित है।
- पुष्प राज चसवाल
- पुष्प राज चसवाल
शुक्रवार, 5 सितंबर 2014
क्षणिका
मन चाहता है कभी
अपनी-पराई चिन्ताएं सभी
सफ़ेद कबूतर बना
ऊपर उड़ा दूँ,
इतने ऊपर
कि, इस अन्धेरे में
बन नक्षत्र
करें दिशाएं प्रशस्त
भूले-भटकों की।
- डॉ. प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प'
त्रासदी
स्वयं से कटा वर्तमान
कब तक लड़ सकेगा
शताब्दियों से संचित अतीत से
जब लगने लगें
अपने क्षण हुए व्यतीत से
पुकारोगे किस दिशा
खोये हुए विश्वास को
जब जी रहे हो त्रासदी में
घिरे हुए संत्रास को
- पुष्प राज चसवाल
बूढ़ा घोड़ा (डॉ. प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प')
"देखो बेटा! ये बात मानने में ही सब की भलाई है।" बिरजू के बूढ़े चाचा ने घुटनों में मुँह छुपाए रोती हुई कजरी की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा।
"बाबा आप भी मुझे ऐसी दशा में माँ-पापा को छोड़ कर जाने की सलाह दे रहे हो?" उसने क्षोभ में आंसुओं भरे चहरे को उठाते हुए कहा, "अभी माँ पूरी तरह ठीक नहीं हुई कि पापा को भी वही शिकायत हो गई है, दोनों की दवाइयों, देखभाल कौन करेगा? फिर अभी छोटी की बारहवीं की पढ़ाई। मैं अभी शादी का सोच भी नहीं सकती। आप मुझे समझने की बजाय माँ-पापा को समझाएं न कि वे शादी की क्यों ज़िद्द कर रहे हैं। मैं हरगिज़ शादी नहीं करूँगी।"
पिछले साल जब से रामकली को ब्रेस्ट कैंसर हुआ था, कजरी तभी से फैक्ट्री में नौकरी करके बिरजू चायवाले के कंधे से कन्धा मिला कर घर-गृहस्थी की गाड़ी चलाने में मदद कर रही थी कि दो माह पहले ही बिरजू को भी पेट में दर्द होने पर पी. जी, आई. ने बड़ी आँत में कैंसर की प्रथम स्थिति बताई। तभी से रामकली ने कजरी की शादी की रट लगा दी। ऐसे में बेटी का विरोध करना जायज़ था। उसने माँ को कड़े शब्दों में कह दिया कि -'मैं शादी किसी भी हालत में नहीं करूँगी,बस आप की देखभाल करूंगी।" रामकली के सास-ससुर तो अब थे नहीं। हार कर उसने अपने चचेरे ससुर को कजरी को समझाने-बुझाने के लिए बुलाया, कजरी उन्हें बहुत आदर देती थी, पर वह उनकी यह बात मानने को कत्तई तैयार न थी। बाबा को चुप और चिंता-मग्न देख उसने दृढ़ता से कहा, "मैं कभी भी शादी नहीं करूँगी, बाबा, जो थोड़ा बहुत कमाती हूँ उसी से गुड्डो को पढ़ा-लिखा दूँगी उसकी शादी कर देना, पर मैं नहीं करूँगी।"
"देखो बिटिया! डा. जी ने कहा है न, दोनों जल्दी ठीक हो जाएँगे और रामकली तो अब काफी ठीक है। और डाक्टरों ने बोला है कि चिंता इस बीमारी को बढ़ा देती है "
"वो तो ठीक है बाबा! ठीक हो रही है माँ, मैं मानती हूँ, पर पापा का इलाज शुरू हो गया है, माँ कैसे संभालेगी छोटी की पढ़ाई और चाय की दूकान।" उसने बीच में ही टोकते हुए कहा।
"तू अपनी जगह ठीक सोच रही है ,पर यह भी सोच के देख, क्या पता तेरी शादी की ख़ुशी से, तेरी सुखद गृहस्थी बसते देख माँ- बाप की सारी बीमारी छूमंतर हो जाए। कौन जाने किस नए जीव के आने से इस घर के भाग बदल जाएँ। और इन दोनों को भी अपनी बच्चियों का सुख देखने को मिल जाए।"
"पर, बाबा...." कुछ बोल पाती कजरी उससे पहले ही बाबा ने फिर कहा, "बीमारी, बेटा, मन की होती है तन की नहीं! और फिर बूढ़ा व्यक्ति जब अपने नाती-पोतों का घोड़ा बनता है तो बूढ़ी हड्डियों में भी नई ताकत आ जाती है, एक बार ये भी सोच के देखना बेटी फिर कोई फैसला लेना।" कुछ देर जब कजरी ने कोई प्रतिक्रिया न आई तो बाबा ने प्यार भरा हाथ उस के सिर पर रखा और उठ कर चल दिए।
गुरुवार, 4 सितंबर 2014
मंज़िल (पुष्प राज चसवाल)
उखड़ती चाल
ठंडी सड़क
अनगढ़ पत्थर
अनाम नदी
बर्बाद शहर
कहाँ उड़ गया मानसरोवर का हंस?
मिटते क़दमों के निशाँ
कौन जाने
क़ाफ़िला
किधर से गुज़रा
गुज़रा भी या नहीं,
दूर-दूर तक
बर्फ़ानी हवाएं
और कुछ भी नहीं।
नहाये हुए दूधिया पहाड़
आदिम सभ्यता के
पुरातन हस्ताक्षर
समेटे हुए हैं
समूची सृष्टि।
खड़े अडिग
मुस्करा कर कह रहे हैं
मानव! मंज़िल हम से परे
होगी कहीं?
- पुष्प राज चसवाल
मन्थन (डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प')
शारदे!
स्थित-प्रज्ञ होना ही
परिणति है ज्ञान की?
एक निश्चित परिपाटी का अवलम्बन
मनन का फिर-फिर मनन
गहन अन्धेरी कन्दराओं की भटकन
अन्ततः आढ़ी-तिरछी रेखाओं के शब्द रचकर
मायावी चक्रव्यूह में फंसते जाना
खोज में लगे सृजनात्मक शब्दों का
व्यापार करते जाना
ही परिणति है ज्ञान की?
खोज.....?
जिसका आधार
हाथ से मुंह का
मुंह से उदर का
एक रिश्ता बन उभरता है
और फिर..........
बढ़ती है एक अन्वेषक क्षुधा
निगलती जाती है रहस्य सभी
गहे-अनगहे
कहे-अनकहे
गुप्त भेद निगलती जाती है
यहां तक कि
निगलना ही चाहती है
अखिलेश्वर की अखिल सृष्टि
ऐटमी खोज के एक अणु बम से!
शारदे!
स्थित-प्रज्ञ होना
स्वरूप है ज्ञान का?
सृजन-विनाश की सीमाएं लांघ
जन्म-मृत्यु को मुट्ठी में बांध
टैस्ट ट्यूब में रचते जाना नई परम्परा
नई सृष्टि, नई संस्कृति,
रसायनों की सृष्टि,
रोबोट- कम्प्यूटरों की सृष्टि,
‘अहं ब्रह्मोअस्मि’ का दावा
संवेदना से परे
गिरते-उठते पदचाप ताण्डव के
रचते जाना ही क्रिया है ज्ञान की?
वैचारिक संहिताओं में
यही मौलिकता आई
कि ज्ञान ने कल्याण के विरूद्ध
मोर्चाबन्दी लगाई,
एक परिपाटी जन्म-मृत्यु की खोजी गई
और इस मन्थन में
अमृत अन्वेषक बुद्धि
विष-कुम्भ को ठोकर मार उड़ेल गई
जो दूब-सा फैलने लगा
भीतर-बाहर, चारों ओर....!
शारदे!
स्थित-प्रज्ञ होना
‘अहं’ नहीं है ज्ञान का?
कारागार के सींखचों में बंद
कैदी की उड़ान
नक्षत्रों,
चन्द्र, सूर्य के पार
आकाश गंगा में या उससे भी परे
भ्रमण करने से चूकी है कभी?
काल-कोठरी का अन्धेरा जितना गहराया
उन्मुक्त उड़ान ने उतना ही दम लगाया
मृत्यु को बान्धता उन्मुक्त मन,
मुट्ठि में प्रलय लिए डोलता मस्तिष्क
समय की परिधि पार कर जाता है
सृजन,
पालन,
प्रलय,
भुलावा बन जाता है
उन्मुक्त आत्म के लिए
बहुत छोटा है अखिल विश्व
वह तो
समय के गुणनखण्ड कर
इसके पर्दे पर
चित्रित करता है
आढ़े-तिरछे चित्र!
आढ़े-तिरछे चित्र!!
- डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'
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