रविवार, 14 सितंबर 2014

गीत: खोई-सी वाणी के स्वर (डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प')

 

खोई-सी वाणी के स्वर अब कहाँ ढूंढने जाऊं।

उद्वेलित अनुभूति को,मैं शब्द कहाँ दे पाऊं?

   

    ठिठुरी सड़कों पर नंगे

    पैरों में फटी बियाई।

    ओसल सुबहों में उठते,

    इन रोओं की गरमाई।

सीने से चिपकी झीनी धोती मैं कहां छिपाऊ।

उद्वेलित अनुभूति को,मैं शब्द कहां दे पाऊँ?


    पहरों पर पहरे कब तक,

    चुपचाप हृदय के होंगे।

    जो देख जिया तड़पेगा,

    क्यों ओंठ सिए ही होंगे।

किस अनजानी कन्दरा में बन्धक रूहें धर आऊँ।

उद्वेलित अनुभूति को,मैं शब्द कहां दे पाऊँ?


    अभिव्यक्ति तड़पे हर क्षण,

    इस मन में और कर्मन में।

    जीह्वा तालू से चिपकी,

    कर बन्धे हैं अभिनंदन में।

औपचारिकता की सांकल, अब कैसे मैं चटकाऊँ।

उद्वेलित अनुभूति को, मैं शब्द कहां दे पाऊँ?

 

- डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें