गुरुवार, 11 सितंबर 2014

अकेले नितांत अकेले

अकेले नितांत अकेले, अविराम 

सागर के असीम विस्तार से आगे 

आकाश की कल्पनातीत ऊंचाई से परे 

क्षितिज के पार दूर - सुदूर तक- उसके आर-पार, 

सौर-मंडल में घूमती, अंतरिक्ष में झूलती 

भव्य धरा की आकर्षण-सीमा से आगे 

लंबा, बहुत लम्बा सफ़र तै किया मैंने,

किन्तु तुम्हारी रहस्यमय सत्ता के 

जादुई विराट दृश्य से वंचित ही रहा,

यहाँ तक वंचित रहा हूँ मैं 

कि संभवतः युगों-युगों तक 

मेरी यह कालातीत यात्रा 

अधूरी ही रहेगी - निरंतर अधूरी,

कौन जाने मेरी इस युगीन यात्रा का 

सतत अधूरापन ही कहीं, 

वह अंतिम सत्य न हो जो 'होने न होने' के 

द्वन्द्व की शाश्वत त्रासदी को 

कालान्तर में झेलते हुए, अनायास ही 

सम्पूर्ण सत्य के नैसर्गिक उद्घाटन का 

विहंगम अवलोकन कर सके,

उस कालजयी मार्मिक क्षण की दिव्यता में 

निमिष-भर तिरोहित हो सके,

जिसकी अक्षुण्ण सत्ता के कारण 

इस विराट सृष्टि की 

व्यापकता एवं सार्थकता 

अक्षत है, अनुपम है, अपरिमित है।      


- पुष्प राज चसवाल  



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