गुरुवार, 4 सितंबर 2014

मन्थन (डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प')

शारदे!   

स्थित-प्रज्ञ होना ही

परिणति है ज्ञान की?

एक निश्चित परिपाटी का अवलम्बन

मनन का फिर-फिर मनन

गहन अन्धेरी कन्दराओं की भटकन

अन्ततः आढ़ी-तिरछी रेखाओं के शब्द रचकर

मायावी चक्रव्यूह में फंसते जाना

खोज में लगे सृजनात्मक शब्दों का

व्यापार करते जाना

ही परिणति है ज्ञान की?

खोज.....?

जिसका आधार

हाथ से मुंह का

मुंह से उदर का

एक रिश्ता बन उभरता है

और फिर..........

बढ़ती है एक अन्वेषक क्षुधा

निगलती जाती है रहस्य सभी

गहे-अनगहे

कहे-अनकहे

गुप्त भेद निगलती जाती है

यहां तक कि

निगलना ही चाहती है

अखिलेश्वर की अखिल सृष्टि

ऐटमी खोज के एक अणु बम से!

शारदे!

स्थित-प्रज्ञ होना

स्वरूप है ज्ञान का?

सृजन-विनाश की सीमाएं लांघ

जन्म-मृत्यु को मुट्ठी में बांध

टैस्ट ट्यूब में रचते जाना नई परम्परा

नई सृष्टि, नई संस्कृति,

रसायनों की सृष्टि,

रोबोट- कम्प्यूटरों की सृष्टि,

‘अहं ब्रह्मोअस्मि’ का दावा

संवेदना से परे

गिरते-उठते पदचाप ताण्डव के

रचते जाना ही क्रिया है ज्ञान की?

वैचारिक संहिताओं में

यही मौलिकता आई

कि ज्ञान ने कल्याण के विरूद्ध

मोर्चाबन्दी लगाई,

एक परिपाटी जन्म-मृत्यु की खोजी गई

और इस मन्थन में

अमृत अन्वेषक बुद्धि

विष-कुम्भ को ठोकर मार उड़ेल गई

जो दूब-सा फैलने लगा

भीतर-बाहर, चारों ओर....!

शारदे!

स्थित-प्रज्ञ होना

‘अहं’ नहीं है ज्ञान का?

कारागार के सींखचों में बंद

कैदी की उड़ान

नक्षत्रों,

चन्द्र, सूर्य के पार

आकाश गंगा में या उससे भी परे

भ्रमण करने से चूकी है कभी?

काल-कोठरी का अन्धेरा जितना गहराया

उन्मुक्त उड़ान ने उतना ही दम लगाया

मृत्यु को बान्धता उन्मुक्त मन,

मुट्ठि में प्रलय लिए डोलता मस्तिष्क

समय की परिधि पार कर जाता है

सृजन,

पालन,

प्रलय,

भुलावा बन जाता है

उन्मुक्त आत्म के लिए

बहुत छोटा है अखिल विश्व

वह तो

समय के गुणनखण्ड कर

इसके पर्दे पर

चित्रित करता है

आढ़े-तिरछे चित्र!

आढ़े-तिरछे चित्र!! 

 

- डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

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