गुरुवार, 11 सितंबर 2014

शब्द


शब्द आदि से ही धरोहर हैं

किन्हीं प्रदत्त अर्थाें की

जिन्हें अक्षर-अक्षर बुना था

अबूझे, अचीन्हे  ब्रह्म ने।

ब्रह्म! या फिर

अक्षर है वह स्वयं ही

और निराकार भी

उस अनाम अचीन्हे को कहाॅं ढूंढे कविता,

ताकि

अर्थ सीखचों में कैद छटपटाते शब्दों को

नई अभिव्यक्ति दे

मुक्त करवा सकें,

खुले आसमान पर अंकित

व निर्वसना धरा पर बिछी सभ्यता को,

आदर्शों-आश्वासनों के

सही मायने समझा सकें।

लीक से हट कर

कुछ नैसर्गिक उद्भावना कर सकें

ऐसी उद्भावना जिससे

खुले आसमान और

निर्वसना धरती पर बिछी सभ्यता को

दिशा मिले सही सही।   



- डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प' 

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