"देखो बेटा! ये बात मानने में ही सब की भलाई है।" बिरजू के बूढ़े चाचा ने घुटनों में मुँह छुपाए रोती हुई कजरी की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा।
"बाबा आप भी मुझे ऐसी दशा में माँ-पापा को छोड़ कर जाने की सलाह दे रहे हो?" उसने क्षोभ में आंसुओं भरे चहरे को उठाते हुए कहा, "अभी माँ पूरी तरह ठीक नहीं हुई कि पापा को भी वही शिकायत हो गई है, दोनों की दवाइयों, देखभाल कौन करेगा? फिर अभी छोटी की बारहवीं की पढ़ाई। मैं अभी शादी का सोच भी नहीं सकती। आप मुझे समझने की बजाय माँ-पापा को समझाएं न कि वे शादी की क्यों ज़िद्द कर रहे हैं। मैं हरगिज़ शादी नहीं करूँगी।"
पिछले साल जब से रामकली को ब्रेस्ट कैंसर हुआ था, कजरी तभी से फैक्ट्री में नौकरी करके बिरजू चायवाले के कंधे से कन्धा मिला कर घर-गृहस्थी की गाड़ी चलाने में मदद कर रही थी कि दो माह पहले ही बिरजू को भी पेट में दर्द होने पर पी. जी, आई. ने बड़ी आँत में कैंसर की प्रथम स्थिति बताई। तभी से रामकली ने कजरी की शादी की रट लगा दी। ऐसे में बेटी का विरोध करना जायज़ था। उसने माँ को कड़े शब्दों में कह दिया कि -'मैं शादी किसी भी हालत में नहीं करूँगी,बस आप की देखभाल करूंगी।" रामकली के सास-ससुर तो अब थे नहीं। हार कर उसने अपने चचेरे ससुर को कजरी को समझाने-बुझाने के लिए बुलाया, कजरी उन्हें बहुत आदर देती थी, पर वह उनकी यह बात मानने को कत्तई तैयार न थी। बाबा को चुप और चिंता-मग्न देख उसने दृढ़ता से कहा, "मैं कभी भी शादी नहीं करूँगी, बाबा, जो थोड़ा बहुत कमाती हूँ उसी से गुड्डो को पढ़ा-लिखा दूँगी उसकी शादी कर देना, पर मैं नहीं करूँगी।"
"देखो बिटिया! डा. जी ने कहा है न, दोनों जल्दी ठीक हो जाएँगे और रामकली तो अब काफी ठीक है। और डाक्टरों ने बोला है कि चिंता इस बीमारी को बढ़ा देती है "
"वो तो ठीक है बाबा! ठीक हो रही है माँ, मैं मानती हूँ, पर पापा का इलाज शुरू हो गया है, माँ कैसे संभालेगी छोटी की पढ़ाई और चाय की दूकान।" उसने बीच में ही टोकते हुए कहा।
"तू अपनी जगह ठीक सोच रही है ,पर यह भी सोच के देख, क्या पता तेरी शादी की ख़ुशी से, तेरी सुखद गृहस्थी बसते देख माँ- बाप की सारी बीमारी छूमंतर हो जाए। कौन जाने किस नए जीव के आने से इस घर के भाग बदल जाएँ। और इन दोनों को भी अपनी बच्चियों का सुख देखने को मिल जाए।"
"पर, बाबा...." कुछ बोल पाती कजरी उससे पहले ही बाबा ने फिर कहा, "बीमारी, बेटा, मन की होती है तन की नहीं! और फिर बूढ़ा व्यक्ति जब अपने नाती-पोतों का घोड़ा बनता है तो बूढ़ी हड्डियों में भी नई ताकत आ जाती है, एक बार ये भी सोच के देखना बेटी फिर कोई फैसला लेना।" कुछ देर जब कजरी ने कोई प्रतिक्रिया न आई तो बाबा ने प्यार भरा हाथ उस के सिर पर रखा और उठ कर चल दिए।
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