गुरुवार, 4 सितंबर 2014

मंज़िल (पुष्प राज चसवाल)


उखड़ती चाल

ठंडी सड़क

अनगढ़ पत्थर

अनाम नदी

बर्बाद शहर

कहाँ उड़ गया मानसरोवर का हंस?

मिटते क़दमों के निशाँ

कौन जाने

क़ाफ़िला

किधर से गुज़रा

गुज़रा भी या नहीं,

दूर-दूर तक

बर्फ़ानी हवाएं

और कुछ भी नहीं।

नहाये हुए दूधिया पहाड़

आदिम सभ्यता के

पुरातन हस्ताक्षर

समेटे हुए हैं

समूची सृष्टि।

खड़े अडिग

मुस्करा कर कह रहे हैं

मानव! मंज़िल हम से परे

होगी कहीं? 

 

- पुष्प राज चसवाल

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