शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

रचनाधर्मिता और सामाजिक सन्दर्भ - डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

                                      

                           मनुष्य की चिंतन-धारा अजस्र बहती रही है। इस धारा में उसने अपने-पराये सुख-दुःख के क्षणों को कभी वास्तविकता और कभी कल्पना में जी कर सुंदर शब्दों में अलंकृत करके पुनः सृजित करने के प्रयास किए हैं। जीवन के अद्भुत क्षणों की अंतरंग अनुभूतियों की पुनः रचना ही साहित्य होता है। यहीं से साहित्य की अजस्र धारा को निरंतरता और व्यापकता मिलती रही है। साहित्य रचना चाहे वास्तविक अनुभूति हो या जग की देखी-सुनी उसमें कल्पना-शक्ति की छौंक के बिना चटपटापन आ ही नहीं सकता और मानव की प्रकृति ऐसे मसालेदार चटपटेपन से ही आनंद की सीमा तक पहुँचने की आदी रही है। रस के लिए मिठास और स्वादानुभूती के लिए रचनाकारों ने जब अपनी भाषा को विविधतापूर्ण अलंकृत किया तो ही वह साहित्यिक रचना के रूप में ढल कर सामने आई। ये रचनाएं मनुष्य को आनन्दित करने के साथ संपूर्ण मानव के मानवोचित्त जीवन के लिए भी संकल्परत दिखायी पड़ी।


मनुष्य एक कल्पनाशील प्राणी है जो यथाशक्ति में जी कर कभी भी खुश नहीं रहता और निरंतर परिवर्तन के लिए नई-नई कल्पनाएँ करता रहता है। आम आदमी के मन में भी आतंरिक स्तर पर जो कल्पनाएँ उभरती हैं वे समाज की तत्कालीन स्थितियों में परिवर्तन की प्रबल इच्छुक होती हैं, वह यही सोचता है 'ये होता तो कितना अच्छा होता या वो होता तो कितना अच्छा होता'। वह यथाशक्ति में सदैव परिवर्तन का आकांक्षी रहा है। अब प्रश्न उठता है कि इस वैज्ञानिक युग में जहाँ रसायनिक विश्लेषणों के परिणाम निहायत अधिकार की भावना के लिए ही सामने आ रहे हैं और मनुष्य ने दो टूक शब्दों में केवल अपने हित की ही बात कहने-सुनने की आदत डाल ली है। ऐसे में साहित्य की लच्छेदार रसात्मक शब्दावली कहीं निरर्थक प्रयास तो नहीं बन कर रह गई? मनुष्य का कल्पना-जगत केवल अपने स्वार्थों के इर्द-गिर्द घेराबंदी करके रेशम के कीड़े-सा अपने ही बुने मायाजाल में फंसकर तो नहीं रह गया? बात अगर रेशम के कीड़े तक ही रहती तो ज़्यादा ख़तरनाक नहीं थी, मनुष्य की स्वार्थ एवं अहम्-भावना ने इसे उस से भी कहीं आगे बढ़ा कर अपने निजी स्वार्थ एवं सुरक्षा के लिए रेशम के स्थान पर आर.डी.एक्स को लपेटना शुरू कर दिया है - तो मानवता अन्दर तक आतंकित हो उठी है। मानवीय मूल्य दिन-प्रतिदिन रसातल में जाते दीख रहे हैं। क्षोभ, त्रास, भय से आम-आदमी का जीना दूभर हो रहा है। ऐसे में फिर से साहित्य में कहीं-न-कहीं आमूल-चूल परिवर्तन की उत्कट आवश्यकता महसूस हो रही है। ऐसा साहित्य जो फिर से मनुष्य को स्वार्थों से ऊपर उठाकर, मनुष्य की श्रेणी में ला सके, मनुष्य की गरिमा को बढ़ाए और मनुष्य को मनुष्यता की पहचान कराये। मनुष्य जन्म जिसे देवों से भी दुर्लभ माना गया है उस के सही मायने उसे समझाए। 


निस्संदेह इस स्वार्थयुक्त और अधिकार भावना में आकंठ डूबे समाज में यह कार्य अत्यधिक कठिन है किंतु असंभव नहीं - देखा गया है कि तत्कालीन समाज में सुधार के लिए परिवर्तन के प्रयास जिन रचनाकारों ने भी किये उन्हें अपने जीते-जी घोर विरोधों का सामना करना पड़ा और विकट परिस्थितियों में जीवनयापन करना पड़ा, किन्तु उनकी साहित्य-साधना और उद्देश्यों की ईमानदारी में लेशमात्र भी कमी नहीं आई। मनुष्य जन्म को देवों से भी दुर्लभ इसलिए माना गया है कि उसमें असम्भव को भी सम्भव बनाने की असीम क्षमता है। तो आईये! हम अपनी उन क्षमताओं को पहचानें और इस संक्रांत समाज में गिरते मानव-मूल्यों को अपने प्रयासों से थामने की कोशिश करें।


ऐसा नहीं है कि पूरे का पूरा समाज केवल स्वार्थ के सम्बंधों से ही लिप्त रहा हो, अनेकों महान विभूतियों ने अपने त्याग और बलिदान से ऐसे प्रेरक उदहारण प्रस्तुत किये हैं जो युगों-युगान्तरों तक आने वाली पीढ़ियों को सन्मार्ग पर प्रशस्त करते रहेंगे। इन्हीं महान विभूतियों के उदात्त प्रयासों की परिणति स्वरूप मानवता की पहचान हो पाती है। यदि ऐसी विभूतियाँ भारत में पैदा न होती तो शायद हम-आप इस खुली हवा में साँस न लेकर गुलामी की बेड़ियों में जकड़े पड़े होते। असंख्य जन ऐसी ही त्याग-भावना को धारण कर अपने प्राणों की सहर्ष आहूतियां दे स्वयं नींव का पत्थर बने, ताकि आज़ाद भारत की सुदृढ़ इमारत उसारी जा सके, और हम स्वच्छन्द रह कर स्वयं अपना विकास कर सकें। आज आज़ादी के छटे दशक के उत्तरार्द्ध पर हम फिर से सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि जिस आज़ाद भारत के स्वप्न को ले कर ये कुर्बानियां दी गई थी क्या वह साकार हो सका! क्या आज की स्थितियां उन स्वप्नों को साकार करने के लिए किन्हीं आमूल चूल परिवर्तन की आकांक्षी होनी चाहियें जिससे कि स्वस्थ समाज की स्थापना हो सके।     


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