रविवार, 14 सितंबर 2014

गीत: साधना (पुष्पराज चसवाल)


दूर नभ पर घिर रहे गहरे जलद,

साँझ की अमराइयाँ संवला गयीं

सो गया चातक तृषित सपने लिए

और शशि  रश्मियाँ गहरा गयीं।


आज मेरा मन तड़पता है उदास,

और मेरी आँख जिज्ञासा भरी

ढूंढती है हर दिशा में रूप

जो कि इसके कोर  पोंछे तरी।


यह अनोखा कालपथ हर क्षण यहाँ

सौ अलंकृत भावनाओं को लिए

सोचता है किस तरह किस रंग में

इन सभी की सृष्टि में रह कर जिए।


मैं इसी पथ पर चले जाता अभी

किन्तु मेरी भावनाएं सब कहीं

रह गई नैराश्य वन में, अब मुझे

हे उमड़ते बादलो! रुकना नहीं।


एक दो बूँदें बरसते ही अभी

सत्य है चातक-हृदय संगीत में,

हर्ष की लहरें उठेंगी, पर मुझे ---

शांति का आभास हो किस प्रीत में?


अर्चना के फूल हाथों में लिए

और आँखों में बसाये अश्रु-कण

शून्य पथ पर बढ़ रहा हूँ सोचता

है कहाँ मम ईष्ट का पूजा भवन?


टीस उठती है हृदय में खोज की

और चलते हैं स्वयं ही पग कहीं

जानता हूँ ईष्ट दर्शन हो, न हो

साधना रूकती नहीं, झुकती नहीं।

साधना रूकती नहीं, झुकती नहीं।

 

 - पुष्पराज चसवाल


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