साहित्य और शब्द सत्ता - पुष्प राज चसवाल
शब्द की सत्ता अन्यतम रूप से सृष्टि के कण-कण में प्रतिष्ठित रही है। शब्द की महिमा प्रत्येक युग, काल, देश एवं परिस्थिति में इतिहास रचती रही है। वह प्रत्येक युग के यथार्थ का, उसकी संस्कृति एवं सभ्यता का, उसके उत्कर्ष एवं ह्रास का शाश्वत साक्षी रहा है। प्रकृति के रहस्यों को, उसके अनछुए पहलुओं को, छद्म रूपों को उजागर करने के प्रयोजन से मनुष्य द्वारा किए जा रहे जिज्ञासापूर्ण प्रयासों को विश्वसनीय दस्तावेज़ी माध्यम से अभिव्यक्त, सुरक्षित एवं संरक्षित रखने का अनुपम कोष सिद्ध हुआ है शब्द और नि:संदेह चिरकाल तक रहेगा।
शब्द एकार्थी है, द्विअर्थी है और बहुअर्थी है --- शब्द राजनैतिक है, सामाजिक है, आर्थिक है, धार्मिक है, आध्यात्मिक है, नैतिक है एवं अपने सर्वोत्तम रूप में साहित्यिक है --- वह भावनाओं के उद्वेलन को व्यंजित करते हुए भावातिरेक की अतिशयता में भावात्मक है, बौद्धिक तर्क एवं विचारों की अतल गहराइयों में अवगाहन करते समय बौद्धिक गद्यात्मक है। वह काव्यमय चिन्तन का, संगीतात्मक विलास का, कलात्मक प्रतिमा-चित्रों का सहज संवाहक है; शासन-प्रशासन एवं सामाजिक सरोकारों को दिशा प्रदान करते समय वह नीति-उपनीति-राजनीति तथा कूटनीति के प्रयोजनों को सशक्त अभिव्यक्ति देते हुए विभिन्न राष्ट्रों एवं शासन-प्रणालियों के मध्य मैत्रीपूर्ण वार्ताओं व वैचारिक आदान प्रदान के समन्वयात्मक सेतुबंध प्रदान करता है।
सृजन की प्रथम वेला से आजतक शब्द की अंतहीन यात्रा में अनगिनत पड़ाव आए, जिनमें से कई तो मधुर स्मृतियों को संजोए हुए कालान्तर में मानवता के प्रेरणा-पुञ्ज बने जबकि कतिपय अन्य कटु एवं विषाक्त अनुभवों के संवाहक रहे। आदिकवि वाल्मीकि-बुद्ध-प्लेटो-कालिदास-कबीर-शेक्सपियर-मिल्टन-ग़ालिब-गाँधी-लिंकन-लेनिन-दान्ते-गैटे-तालस्ताय जैसे कितने ही शब्द के धनी हुए हैं; वे अपनी कालजयी कृतियों से मनस:-वाच:-कर्मण: मनुष्यता के ऐसे लाजवाब आलोक स्तम्भ बन गए हैं जो जाति-सम्प्रदाय-वर्ण-धर्मान्धता-रंगभेद वगैरह से पूरी तरह ऊपर उठ कर मानवता के सर्वोच्च शिखर से मानव-मात्र के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसके विपरीत कुछेक अधम ऐसे दुर्दान्त दानवी वृत्ति के पोषक हुए जिन्होंने हिंसक पशुता का नंगा नाच खेला तथा शब्द एवं वाणी का दुरूपयोग वीभत्स की सीमा तक करते हुए प्रलयंकारी विध्वंस की विनाशलीला खेली और मानवता को कलंकित किया --- इनमें चंगेज़, तैमुर, गज़नवी, नादिरशाह, अहमदशाह, हिटलर, मुसोलिनी जैसे कई और हृदयहीन आतताई भी शामिल हैं।
अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा से भरे विज्ञानं एवं तकनीकी के इस युग में जहाँ हमें प्रथम पंक्ति में बने हुए अग्रणी भूमिका का निर्वाह करना है वहीं मानव-मात्र के प्रति उदात्त नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा को नित्य-प्रति मिल रही चुनौतियों से निपटने में भी खरा उतरना है। हमें विश्व-समुदाय को याद दिलाते रहना है कि विभिन्न राष्ट्रों द्वारा वैश्विक स्तर पर किए जा रहे आदान-प्रदान, व्यापार-व्यवसाय, बाज़ारवाद, पूंजी-निवेश आदि के प्रयासों में किसी भी प्रकार से किसी के भी द्वारा एकाधिकार की चेष्टा करना विश्व-बन्धुत्व के वृहत्तर उद्देश्य के प्रति घातक हो सकता है। संचार संसाधनों एवं उपकरणों में नित्य-प्रति आ रहे नवीन क्रन्तिकारी परिवर्तनों ने वैश्विकरण एवं बाज़ारवाद के चलते विभिन्न राष्ट्रों तथा समाज-समूहों को जहाँ प्रगति करने एवं विचार-विनिमय के अभूतपूर्व अवसर प्रदान किए हैं वहीं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा व इसमें मची अन्धी दौड़ में आगे निकलने की ललक ने बिना होश खोए पूरी क्षमता के साथ अपनी भूमिका का चयन करना अत्यंत चुनौतिपूर्ण बना दिया है।
हमें सूचना प्रौद्योगिकी से प्रतिक्षण प्रभावित हो रहे इस विज्ञापन युग में भी, निस्संदेह व्यौमफूल से बातें करनी हैं, पर साथ ही धरती मां से जुड़े रहना है। धरती मां का यथार्थ ही हमारी न्याय-परक दृष्टि का, उसकी दिशा का निर्माण करेगा। यदि वह यथार्थ कड़वा है तो लेखन में उस त्रुटि के निराकरण का संकेत ऊर्जापूर्ण संयत शब्दों में साहित्यिक सौष्ठव का निर्वाह करते हुए कोई शब्दकार ही तो करेगा। हाँ, इससे आगे का क्षेत्र किसी शब्द-शिल्पी का न हो कर, सुधारक का है।
प्रख्यात दार्शनिक अरस्तु से लेकर आजतक कितने ही समालोचकों, समीक्षकों, मनीषियों एवं रचनाकारों ने साहित्य/काव्य को परिभाषित करने का सद्प्रयास किया है। किसी ने इसे मात्र बौद्धिक विलास कह कर छुट्टी पा ली तो किसी ने इसे यथार्थ की अनुकृति बता कर मध्यम श्रेणी में रख दिया। कुछेक ने इसे सर्वोत्तम शब्दों के सर्वोत्तम चयन की संज्ञा से अभिहित किया जबकि अन्य ने वियोग/विरह को साहित्यिक सृजन की मूल प्रेरणा माना। कइयों ने साहित्य में शैली को ही सबकुछ मान लिया। सम्भवत: प्रत्येक युग में धरती मां से जुड़े रह कर, उसमें आ रहे परिवर्तनों/घटनाओं/प्रतिक्रियायों को दरपेश आ रही चुनौतियों के मद्देनज़र; देश, काल एवं स्थिति के केन्द्र में न्यायपरक साहित्यिक दृष्टि सजग रूप से बनाये हुए; सामाजिक सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में दलगत राजनीति व साहित्यिक खेमेबन्दी से पूरी तरह ऊपर उठते हुए; हर प्रकार के अन्याय, अत्याचार, दुराचार, अनैतिक आचार एवं शोषण के विरोध में शब्दों के सभ्य अनुशासन को बिना त्यागे, ज़ोरदार आवाज़ में अपना मत रखना है जो शब्दकार की निष्ठा, स्वप्न के प्रति प्रतिबद्धता एवं जनवादी दृष्टि का द्योतक ही कहा जाएगा। हिन्दी के उज्ज्वल भविष्य के प्रति असंख्य सपनों एवं शुभकामनाओं को अंतर्मन में संजोये साहित्यिक शब्दों की ऊर्जा में अभिव्यक्त ऐसा शब्द साहित्य सृजन करने का प्रयास किया जाए जो समूचे मानव समाज को समन्वय-समानता-सहयोग से संपृक्त आदर्श स्वप्न की प्रेरणा देता रहे।
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