शनिवार, 20 सितंबर 2014

सैलाब (डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प')


सैलाब

१ 

सैलाब उमड़ता है
डूब जाता है कोना-कोना
स्वाभाविक हो या प्राकृतिक
अंतिम परिणति
बस रोना ही रोना!


  २
भावों का सैलाब
भिगो जाता है अंतर्मन
फिर
बरसते हैं नयनों से
उमड़ते घन!


 ३
सैलाब कैसा भी हो
सब कुछ लील जाता है
शून्य निहारता बेबस मानव
भूलों पर
पछताता है?



-डॉ प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प' 

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