समय की गतिशील निरंतरता जारी है, उहा-पोह की दौड़ में विश्व विभिन्न तरह के घटनाचक्रों में उलझा हुआ है। जब भी क़िताब-कलम उठाई एक नयी तरुणाई का उदय हुआ और साहित्यिक संसार के शब्दों ने कभी झिंझोड़ा, कभी सहलाया, कभी एक ताज़ा-दम सांस, कभी उल्लास और कभी वेदना से परिपूर्ण रुके-रुके से, तो कभी उत्साह से सराबोर नयी सुबह का आगाज़..... दौड़ता हुआ संसार भी सार्थक हो गया, हमारे क़दम दम भर रुक जो पाये…..चश्मे के कोर से ज़रा देखा तो हाथों में तुम्हारे हाथ का एहसास अभी तक नर्म… आह, चाय! लो फिर, कुछ नया सुनो!
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