शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बात सगाई की (प्रेमलता प्रेमपुष्प)

'देखो! जानकी जिस घर में मैं तुम्हारी बेटी नीति के रिश्ते की बात चला रही हूँ कसबे के माने हुए ज़मीदार हैं।' 
'पर बुआ..... '
जानकी कुछ आगे कह पाती बुआ ने बीच में ही टोक कर कहा, 'अरी, पर-वर क्या, मैं कहती हूँ, आँख बंद करके हाँ करदे। इतना बड़ा घर-परिवार, मुंह चढ़ कर रिश्ता मांग रहे हैं, राज करेगी तुम्हारी बेटी, उस घर में, राज।'
'पर बुआ, एक तो लड़का टांग से सही नहीं।' 
बुआ ने फिर टोका, 'अरे वो तो ज़रा-सा झुक कर चलता दीखता है, पर यूँ तो लड़का सनक्खा है।'   
'फिर कोई रूज़गार भी तो नहीं उसका।'
'क्या बात करती है, जानकी! उसे रूज़गार की क्या ज़रूरत पड़ी है?'
'फिर भी बुआ, हम ग़रीब सही, पर अपनी पढ़ी-लिखी बेटी को ऐसे कैसे ……'  
उतावली बुआ ने गोशे में ज़ोर देते हुए कहा, 'मैं कह रही हूँ बहुत बड़ा घर है, तेरी बेटी सुबह उठ कर घर बुहारेगी न, तो अपना पेट भरने से ज़्यादा ही अनाज मिल जावेगा उसे, समझी!'
'हाँ! समझी बुआ। अच्छे से समझी।' 
'तो फिर ...क्या बोलूं, उनको कि बात पक्की।'
'हाँ,एक बात पक्की बुआ, उनको कह दे …'
'क्या?'
'यही कि जानकी अपनी पढ़ी-लिखी बेटी को घर बुहार कर पेट भरने की गरज से किसी घर में हरगिज़ न ब्याहेगी। समझी।'
जानकी कह कर चल दी। बुआ हैरानी से आँखें फाड़े अपने मोटे चश्मे से उसे जाते हुए देखती रह गई।    

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